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टनकपुर: कुमाऊं और नेपाल में परंपरागत ढंग से मनाया जाता है कथा और मान्यताओं से भरा गौरा पर्व – Utkal Mail

देवेन्द्र चन्द देवा, टनकपुर, अमृत विचार। कुमाऊं के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल का आंठू यानी गौरा पर्व धूमधाम और परंपरागत ढंग से मनाया जाता है। पंचमी  के दिन आज शनिवार से इस पर्व का आगाज हो जाएगा। वहीं इस पर्व का मुख्य आकर्षण 26 अगस्त को अष्टमी पर आंठू पर्व होगा। 

मान्यताओं के साथ पौराणिक आधार पर प्रत्येक वर्ष धान की रोपाई समाप्त होने के बाद इस पर्व का आगाज हो जाता है। पौराणिक मान्यता है कि मां पार्वती जिसे गौरा रूप भी दिया जाता है ने भगवान शिव यानी महेश्वर को वर के रूप में मांगने के लिए घनघोर तपस्या की थी।

इस दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा। बाद में उनकी तपस्या के फलस्वरूप ही उनका विवाह भगवान शिव के साथ संपन्न होता है। कहा जाता है कि इन्हीं मान्यताओं व पौराणिक कथा के आधार पर उनके विवाह के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि भाद्र माह के पंचमी पर्व पर शुद्ध तांबे के बर्तन में पांच धान्य जिसमें गेहूं, चना, गुरूस, मास व गहत शामिल हैं, उन्हें भिगोया जाता है।जिन्हें बिरुडा कहा जाता है। वही अगले दिन बिरूड़ा को साफ पानी से धोकर स्वच्छ स्थान या मंदिर में रखा जाता है। 

सप्तमी पर्व पर विवाहित महिलाएं जिस स्थान पर बिरुड़ा रखे होते हैं उस स्थान पर रखे गए दूब धागा को गले व हाथ में बांधकर सुख समृद्धि के लिए मन्नत और कामनाएं करती हैं। वही अष्टमी पर्व पर गौरा मैदान पर खेल का आयोजन किया जाता है। जिसमें महिलाओं, पुरुषों और बच्चों द्वारा खेल, झोड़ा और चाचरी गाने प्रस्तुत किए जाते हैं।

इस दौरान मां गौरा व महेश्वर की घास, कुश समेत 9 चीजों से बनाई गई उनकी मूर्ति को अच्छे वस्त्र पहनाकर डोले में रखकर उन्हें घुमाया जाता है और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान गीतों के माध्यम से मां गौरा द्वारा किए गए तप का वर्णन भी बखूबी किया जाता है। अष्टमी पर्व पर पांच धान्यों से भिगोये गए बिरूड़ा से मां गौरा और महेश्वर भगवान की पूजा अर्चना की जाती है। वहीं डंगरियों व पुजारियों द्वारा पूजा अर्चना कर लोगों को अक्षत लगाकर उन्हें आशीर्वाद दिया जाता है। बाद में बिरूड़ को घर में एक दूसरे का पूजन कर उनके सुख समृद्धि की कामना की जाती है। 

पिथौरागढ़ और गुमदेश में गौरा पर्व को जीवित रखा है 
भले ही गौरा पर्व कुमाऊं के अन्य हिस्सों में अब महज औपचारिक तक रह गया है, लेकिन आज भी जनपद पिथौरागढ़ के साथ जनपद चम्पावत के नेपाल सीमा से लगे गुमदेश क्षेत्र में इस पर्व को धूमधाम से मनाया जा रहा है। यहां यह पर्व सप्ताह से भी अधिक समय तक संचालित होता है जबकि गुमदेश क्षेत्र में गौरा पर्व में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पड़ोसी देश नेपाल से भी लोग बढ़-चढ़कर प्रतिभाग करते हैं। दूसरी ओर पड़ोसी देश नेपाल में यह पर्व धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस समय नेपाल में इस पर्व की खासी धूम मची हुई है।


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