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China: भारी मात्रा में चीनी डेटा को लेकर चिंतित है चीन, वैश्विक लेखा परीक्षकों को क्यों बना रहा है निशाना – Utkal Mail


हांगकांग। डेटा सुरक्षा को लेकर चीन की चिंता भूराजनीतिक तनाव और नियामक परिवर्तन लेखा परीक्षण और परामर्श से जुड़ी कंपनियों के लिए चुनौती पैदा कर रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने एक दशक पहले कहा था, “ जो भी बड़े डेटा प्रौद्योगिकियों को नियंत्रित करेगा उसका विकास के लिए संसाधनों पर नियंत्रण होगा तथा उसी की बात सुनी जाएगी।” चीनी कंपनियों के डेटा तक किसकी पहुंच हो, इस पर लगाम कसने के लिए चीन ने अंतरराष्ट्रीय वित्त और वाणिज्य के वैश्विक स्तंभों में से एक, दुनिया की सबसे बड़ी ऑडिटिंग और परामर्श कंपनियों को निशाना बनाया है। 

मई में बीजिंग ने जब सरकारी कंपनियों और देश में सूचीबद्ध कंपनियों से कहा था कि वे अपने लेखाकारों पर सुरक्षा जांच बढ़ाएं तो यह डेटा पर नियंत्रण को लेकर बड़ी वैश्विक रणनीति का हिस्सा था, खासकर इस बात पर कि वे संवेदनशील डेटा को कैसे संभालते हैं। फिलहाल, ‘बिग फॉर’- ‘डेलॉयट एंड टच’, ‘अर्नस्ट एंड यंग’ और केपीएमजी और प्राइस वॉटर हाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) के पास चीन की अधिकतर कंपनियों की लेखा जांच का काम है। चीन क्यों चाहता है कि स्थानीय कंपनियां इन अमेरिकी कंपनियों से पीछा छुड़ाएं और उनकी जगह स्वदेशी कंपनियों को नियुक्त करें। इसके कई कारण हैं।

बीजिंग भारी मात्रा में चीनी डेटा को लेकर चिंतित है, जिस तक दूसरे देशों से जुड़ी कंपनियां अपनी लेखा परीक्षण और परामर्श सेवाओं के माध्यम से पहुंच रखती हैं। हाल में दूसरे देशों से जुड़ी विदेश कंपनियों के स्थानीय दफ्तरों में छापेमारी की गई थी। यह कार्रवाई चीनी प्रवर्तन एजेंसियों ने जासूसी रोकथाम जांच के तहत की थी। चीनी कंपनियों पर निगरानी कड़ी करने का चलन 2020 में शुरू हुआ जब सरकार ने शंघाई और हांगकांग में अलीबाबा की फिनटेक कंपनी, एंट ग्रुप के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ)को टाल दिया था। तब से, चीनी सरकार ने अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों के विनियमन को कड़ा कर दिया है, जिसे वह राष्ट्रीय हितों को कमजोर करने वाला वाणिज्यिक कदाचार कहती है। 

अबतक बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों समेत कई कंपनियों पर निगरानी कड़ी कर दी गई है। कंपनियों पर जुर्माना लगाया गया है, उन पर विदेशी आईपीओ रद्द करने का दबाव डाला गया है। मई में, वित्त मंत्रालय, सरकारी संपत्ति निगरानी एवं प्रशासन आयोग और चीन प्रतिभूति नियामक आयोग ने संयुक्त रूप से निर्देश जारी कर सरकारी कंपनियों और देश में सूचीबद्ध कंपनियों से अपने लेखाकारों पर सुरक्षा जांच बढ़ाने का आग्रह किया था। फरवरी में मीडिया में आई एक खबर में कहा गया था कि चीन सरकार ने सरकारी उपक्रमों से कहा है कि वे स्थानीय लेखाकारों को नियुक्त करें।

 चीन के नियामकों ने इस बारे में अब तक कोई आधिकारिक दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं लेकिन चीन के नीति निर्माता चाहते हैं कि रणनीतिक क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां खुद को अमेरिकी हितों से अलग करें। अमेरिका और चीन के बीच मौजूदा प्रौद्योगिकी स्पर्धा के साथ-साथ दोनों देशों की सरकारों द्वारा नए नियम बनाकर विदेशी कंपनियों का निरीक्षण करने की शक्तियां हासिल करने से व्यापार और निवेश के रिश्ते खराब हुए हैं। ‘बिग फॉर’ लेखा कंपनियों को 1990 के दशक में चीन में कामकाज करने की अनुमति मिली और इन्होंने अपना विस्तार किया और चीन के बाजार पर इनका प्रभुत्व है। इनके मुख्यालय अमेरिका में हैं।

 चीन की 98 सरकारी कंपनियों में से 24 का ऑडिट इन ‘बिग फॉर’ ने किया था। चीनी नेताओं के देश के लेखा परीक्षकों को प्राथमिकता देने के पीछे दो कारण हैं। दरअसल, लेखा परीक्षकों को अपने ग्राहकों की व्यावसायिक जानकारी और वित्तीय स्थिति तक पूरी पहुंच होती है। कंपनी की रणनीतियों, ग्राहक डेटा, सरकार की मदद और वरिष्ठ प्रबंधन का व्यक्तिगत विवरण न सिर्फ वाणिज्यिक राज़ होते हैं बल्कि ऐसी सामग्री भी है जिसे चीनी नेता रणनीतिक और संवेदनशील मानते हैं। चीन के नीति निर्माता उन्नत प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियों के डेटा को विदेशी संस्थाओं की पहुंच से दूर रखना चाहते हैं।

वे औद्योगिक और प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा को बनाए रखने के चलते ऐसा चाहते हैं। दूसरा, विदेशी लेखा परीक्षकों या विदेशी मूल की कंपनी से जुड़ी स्थानीय लेखा कंपनियां वहां के कानून मानती हैं जहां उनकी मूल कंपनियां पंजीकृत होती हैं। इस वजह से ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं जिनमें चीन के हितों को नुकसान पहुंचेगा। उदाहरण के लिए, अमेरिकी कंपनियों से जुड़े लेखा परीक्षकों को अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियां चीनी ग्राहकों के कुछ डेटा सौंपने का अनुरोध कर सकती हैं। 

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