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गाजा में युद्धविराम संबंधी प्रस्ताव से दूरी सरकार का कायरतापूर्ण कृत्य: कांग्रेस ने केंद्र पर साधा निशान – Utkal Mail

नई दिल्ली। कांग्रेस ने शनिवार को दावा किया कि गाजा में युद्धविराम की मांग वाले संयुक्त राष्ट्र के मसौदा प्रस्ताव पर मतदान से भारत सरकार का दूरी बनाना ‘‘नैतिक रूप से कायरतापूर्ण कृत्य’’ है और युद्धविराम के लिए वोट देने से डरने वाली सरकार भारत या दुनिया को नैतिक दिशा तथा नेतृत्व देने के लायक नहीं है। 

मुख्य विपक्षी दल ने यह सवाल भी किया कि पिछले छह महीनों में ऐसा क्या बदलाव आया जिसके कारण भारत ने युद्धविराम का समर्थन करना बंद कर दिया और फ़लस्तीन पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सैद्धांतिक रुख को भी छोड़ दिया? संयुक्त राष्ट्र महासभा में गाजा में ‘‘तत्काल, बिना शर्त और स्थायी’’ युद्धविराम की मांग वाले मसौदा प्रस्ताव पर मतदान से भारत ने परहेज किया। महासभा में स्पेन द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर मतदान हुआ। 

इस प्रस्ताव में तत्काल, बिना शर्त तथा स्थायी युद्धविराम और हमास तथा अन्य समूहों द्वारा बंधक बनाए गए सभी लोगों की तत्काल तथा बिना शर्त रिहाई की मांग की गई। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘भारत हमेशा शांति, न्याय और मानवीय सम्मान के लिए खड़ा रहा है। लेकिन आज भारत दक्षिण एशिया, ब्रिक्स और एससीओ में गाजा में युद्धविराम की मांग करने वाले प्रस्ताव से दूरी बनाने वाला एकमात्र देश है।’’ 

उन्होंने सवाल किया कि क्या भारत युद्ध के ख़िलाफ़, नरसंहार के ख़िलाफ़ और न्याय के लिए अपने सैद्धांतिक रुख से पीछे हट गया है? वेणुगोपाल ने कहा कि विदेश मंत्रालय को स्पष्ट करना चाहिए में पिछले छह महीनों में ऐसा क्या बदलाव आया जिसके कारण भारत ने युद्धविराम का समर्थन करना बंद कर दिया? 

उन्होंने कहा, ‘‘हम जानते हैं कि इस सरकार को नेहरू जी की विरासत का बहुत कम सम्मान है, लेकिन फ़लस्तीन पर वाजपेयी जी के सैद्धांतिक रुख को भी क्यों छोड़ दिया?” कांग्रेस महासचिव ने इस बात पर जोर दिया, “भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया में युद्धविराम, शांति और बातचीत के लिए एक सैद्धांतिक आवाज़ रहा है। गुटनिरपेक्षता और नैतिक कूटनीति की हमारी विरासत रही है। 

भारत ने ऐतिहासिक रूप से वैश्विक संघर्षों में न्याय और मानवीय मूल्यों का समर्थन किया है।” कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने कहा कि भारत का 12 जून, 2025 को संयुक्त राष्ट्र में गाजा युद्धविराम पर मतदान से दूर रहना एक चौंका देने वाला नैतिक रूप से कायरतापूर्ण कृत्य है साथ ही यह हमारी उपनिवेशवाद विरोधी विरासत और स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों के साथ शर्मनाक विश्वासघात है। 

उन्होंने कहा, ‘‘ कभी भारत ने फलस्तीन के लिए मजबूती से खड़ा होकर इतिहास रचा था । 1974 में फलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना, 1983 में नयी दिल्ली में आयोजित 7वें गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नैम) शिखर सम्मेलन में यासिर अराफात को आमंत्रित किया और 1988 में औपचारिक रूप से फलस्तीनी राज्य को मान्यता दी।” 

खेड़ा ने इस बात पर जोर दिया, ” हमने न्याय के लिए रणनीति के तौर पर नहीं बल्कि सिद्धांत के तौर पर खड़े होने का चुनाव किया था। लेकिन आज वह गौरवशाली विरासत मलबे में तब्दील हो चुकी है।” उन्होंने दावा किया , “आज भारत तेल अवीव के आगे झुक गया है, उन सिद्धांतों को छोड़कर, जिन्होंने कभी हमें दुनिया के नैतिक मूल्यों का दिशा देने वाला बनाया था। 

खेड़ा ने कहा, ” वैश्विक नेतृत्व चुप्पी और चापलूसी पर नहीं बनता। अगर हम चाहते हैं कि वैश्विक मंच पर हमारी आवाज़ मायने रखे तो हमें सबसे जरूरी वक्त पर बोलने का साहस दिखाना होगा। ” भारत समेत 19 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया, जबकि 12 देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया और पक्ष में 149 वोट पड़े।

 ‘नागरिकों की सुरक्षा और कानूनी एवं मानवीय दायित्वों को कायम रखना’ शीर्षक वाले प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि भारत गहराते मानवीय संकट से बहुत चिंतित है और नागरिकों की मौत की घटना की निंदा करता है। हरीश ने कहा कि भारत पहले भी इजराइल-फलस्तीन मुद्दे पर प्रस्तावों से दूर रहा है। 


utkalmailtv

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