धर्मभारत

संभाजी के गीतों ने जोश भरा, ऊषा के एकपात्री नाटक ”रमाई ” ने किया भावुक

भिलाई। सामाजिक आर्थिक बदलाव के लिए कार्यरत गैर राजनीतिक संस्थाओं एवं व्यक्तियों के स्वस्फूर्त संयुक्त प्रयास से मूलनिवासी कला साहित्य और फिल्म फेस्टिवल 2022 में फिल्म प्रदर्शन, वैचारिक सत्र और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां जारी है। नेहरू सांस्कृतिक सदन सेक्टर-1 भिलाई में जारी इस आयोजन में पहले दिन लोकगायक संभाजी भगत ने अपनी जोशीली गायिकी से समा बांध दिया। वहीं नागपुर से आईं ऊषा ताई बौद्ध की एक प्रस्तुति नाटक ”रमाई” ने दर्शकों को भावुक कर दिया।

अपने काव्यात्मक संवादों की संगीतमय प्रस्तुति से सोते हुए लोगों को जगा देने वाले लोकशाहीर संभाजी भगत द्वारा गाया गया गीत ”ये हिटलर के साथी” ने देश के वर्तमान हालात को सबके सामने साक्षात प्रस्तुत कर दिया। उन्होंने और उनके साथियों ने फैज अहमद फैज की दुनिया भर में गायी जा रही नज़्म ”हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे” गाने के साथ, एक के बाद एक शानदार गीत गाए जो सीधे लोगों के दिलों में उतर गए। संभाजी भगत की प्रस्तुति ने यहां ऐसा समा बांधा कि पूरे हॉल में ”वंस मोर” गूंजने लगा। ऐसे में आयोजकों के अनुरोध औऱ् दर्शकों की इच्छा को देखते हुए संभाजी भगत ने दूसरे दिन रविवार को भी अपनी शानदार प्रस्तुति दी।

इसी तरह डा भीमराव अंबेडकर की पत्नी रमाबाई के दुख दर्द को बयां करने का काम नागपुर से आई उषा ताई बौद्ध ने किया। उन्होंने अपने सारगर्भित प्रस्तुतिकरण में उन्होंने तत्कालीन समय को मंच पर जीवंत कर दिया और रमाई के दुख और दर्द को दिखाकर दर्शकों की आंखे नम कर दी।

पहले दिन दोपहर 2:00 बजे से लघु फिल्मों का प्रदर्शन हुआ जिसका संयोजन शेखर नाग एवं एलेक्स शाक्य ने कया। दोपहर में ” भारत का संविधान और आदिवासियों के अधिकार ” विषय पर महाराष्ट्र से आए अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लेखक तथा आदिवासी मुद्दों के नामी पैरोकार लटारी कवडू मडावी ने अपना उद्बोधन दिया।इसके बाद सासाराम बिहार के बौद्ध कालीन पुरातत्व के प्रख्यात अध्येता, इतिहासकार और भाषा वैज्ञानिक प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने ”प्राचीन भारत का इतिहास और सभ्यता का पुनरावलोकन” विषय पर अपनी बात रखी।

दूसरे दिन 13 नवंबर रविवार को सुबह 9:30 बजे से लोकनृत्यों की शानदार प्रस्तुति हुई। सुबह 10:00 बजे कला प्रदर्शनी में कला तथा कलाकारों का परिचय शिल्पकार राजेंद्र सुनगरिया ने दिया। सुबह 10:30 बजे से स्कूली बच्चों द्वारा नाटक की प्रस्तुति हुई। इसके उपरांत 11:00 बजे से ”मूलनिवासी युवा वर्ग के सामने भविष्य की चुनौतियां” विषय पर मोटिवेशनल स्पीकर एनसीआर दिल्ली के डॉक्टर नरेंद्र सिंह ने युवाओं से बातचीत की।
दोपहर 12:00 बजे छत्तीसगढ़ी लोक गायक यशवंत सतनामी का गायन हुआ। दोपहर 12:30 लेखक संजीव खुदशाह ” वे दस किताबें जो बदल सकती हैं मूलनिवासी युवाओं का भविष्य ” विषय पर संवाद किया। दोपहर 1:00 से भीम गीतों की प्रस्तुति हुई। दोपहर में दुर्ग निवासी राकेश बम्बार्डे के निर्देशन में नाटक ” वे आरक्षण से क्यों डरते हैं?” का मंचन हुआ।
दोपहर में फिल्म निर्देशक सुबोध नागदेवे ने ”मूलनिवासी युवाओं के लिए फिल्मों में काम तथा रोजगार के अवसर” विषय पर संवाद किया। दोपहर 2:30 से सामूहिक पंथी नृत्य हुआ। शाम 4:00 बजे से स्कूली बच्चों का फैंसी ड्रेस के साथ हमारे पुरखों के संवाद का आयोजन हुआ।

शाक्यमुनि बुद्ध से पहले 27 बुद्ध और हुए:राजेंद्र प्रसाद

आयोजन में अपनी बात रखते हुए प्रख्यात भाषाविद् और बौद्धकालीन पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि अंग्रेजी के बहुत से शब्द है, जो बौद्ध सभ्यता की देन है। उन्होंने बताया कि सम्राट अशोक ने ”लिपि” नहीं ”लिबि” शब्द का प्रयोग किया है। यह ”लिबि” ग्रीक में जाकर ”लिबर” हुआ जिसका मतलब है किताब और यही लैटिन भाषा में ”लाइब्रेरी” हो गया। सबसे पहले ”लिबि” बनी, फिर किताब लिखी गई। फिर ”लिबर” शब्द बना और लिबर का जमा ”लाइब्रेरी” बनीं। उन्होंने बताया कि जैसे सिख पंथ में 10 गुरू हैं उसके पहले बुद्ध धर्म की परंपरा में 28 बुद्ध आते हैं। उन्होंने बताया कि नेपाल के निगलीहावा में सम्राट अशोक का एक स्तंभ लेटी हुई अवस्था में है, जिसमें कोड़ाडोमन बुद्ध की स्मृति में बनवाने का उल्लेख है। नेपाल को गोटिहावा में भी एक स्तंभ है, जिसे  ककुसंध बुद्ध की स्मृति में बनवाया था। लुंबिनी में शाक्यमुनि बुद्ध की स्मृति में सम्राट अशोक ने स्तंभ बनवाया। कश्यप बुद्ध का गांव अलेक्जेंडर कनिंघम ने खोजा था। ऐसे तमाम बौद्ध के अवशेष मिलते हैं।

लोकगायन से चेतना जगाना मेरे लिए मिशन:संभाजी

लोकगायक संभाजी भिड़े ने कहा कि अपनी गायकी के माध्यम से समाज के दलित, शोषित समुदाय में चेतना जगाना उनके लिए एक मिशन की तरह है। ये जो संवैधानिक मूल्य औऱ व्यवस्था हमको विरासत में मिले हैं उसे घर-घर तक ले जाने के लिए ये काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से हम पूरे देश को जोड़ना चाहते है, इंसानों को जोड़ना चाहते हैं। संभाजी ने कहा कि अपनी लोकगायिकी के माध्यम से वह देश की विकट परिस्थिति का माहौल तोड़ना चाहते हैं। इसलिए जहां से भी बुलावा आता है, तुरंत चले जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनके समूह में 7 लोग हैं। संभाजी ने उम्मीद जताई कि देश के युवा ही मौजूदा माहौल से हम सबको बाहर निकालेंगे।

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