Israel Hamas War : 'सबकी आंखों के सामन एक मानवीय आपदा हो रही है', UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने गाजा में हो रही तबाही पर दी चेतावनी – Utkal Mail
न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने गाजा में हो रही तबाही के प्रति चेतावनी देते हुए कहा है सबकी आंखों के सामन एक मानवीय आपदा हो रही है। शनिवार रात हुई भारी बमबारी ने गाजा को तबाह कर दिया और इसे बाहरी दुनिया से लगभग अलग-थलग कर दिया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने गाजा में तत्काल, दीर्घकालिक और सतत मानवीय संघर्षविराम का आह्वान करते हुए 14 के मुकाबले 120 मतों से एक प्रस्ताव पारित किया लेकिन लड़ाई रोकने के लिए इस भारी समर्थन के बावजूद भी गाजा की स्थिति पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा और इजरायली सैन्य कार्रवाई एक निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है।
यूरोपीय संघ के विदेश मामलों के उच्च प्रतिनिधि जोसेप बोरेल ने एक ट्वीट में चेतावनी देते हुए कहा, गाजा पूरी तरह से ब्लैकआउट और अलगाव की स्थिति में है। इस बीच भारी गोलाबारी जारी है। गाजा में स्थिति बहुत हताश करने वाली है, जहां लोग बिजली, भोजन, पानी के बिना रह रहे हैं। बच्चों सहित बहुत सारे नागरिक मारे गए हैं जो कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के खिलाफ है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव में शुक्रवार को गाजा में मानवीय संघर्षविराम का आह्वान करने के अलावा यह आशा भी व्यक्त की गयी कि इससे शत्रुता समाप्त हो जाएगी।लेकिन एकमात्र शक्ति जो ऐसा कर सकती है, उसने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की दूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने कहा कि अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया है क्योंकि इसमें हमास की निंदा नहीं की गई और बंधकों की रिहाई का आह्वान नहीं किया गया।
गुटेरेस ने दुनिया से यथास्थिति से बाहर निकलने का आग्रह किया। उन्होंने अपने भाषण में कहा, हम पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता के लिए एकमात्र यथार्थवादी मूल सिद्धांत, दो-राष्ट्र समाधान का दृष्टिकोण नहीं खो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने गाजा में तत्काल, दीर्घकालिक और सतत मानवीय संघर्षविराम का आह्वान करते हुए 14 के मुकाबले 120 मतों से एक प्रस्ताव पारित किया। अमेरिका और इजरायल के अलावा 12 अन्य देशों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इनमें प्रशांत क्षेत्र के पांच द्वीप राष्ट्र और चार यूरोपीय देश ऑस्ट्रिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य और हंगरी शामिल हैं। यूरोपीय संघ के आठ सदस्य देशों ने प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से तीन – चीन, फ्रांस और रूस ने भी प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया। अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया जबकि ब्रिटेन अनुपस्थित रहा। अरब और इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) देश, जिन्होंने 40 अन्य देशों के समर्थन से प्रस्ताव पेश किया, उन्हें विश्वास था कि चीन और रूस पक्ष में मतदान करेंगे, लेकिन फ्रांस की ओर से समर्थन करना उनके लिए एक सुखद आश्चर्य था। सुरक्षा परिषद में अरब प्रतिनिधि और यूएई की राजदूत लाना नुसीबेह ने इस परिणाम पर खुशी व्यक्त की। मतदान के बाद उन्होंने कहा कि इस तरह के भू-राजनीतिक माहौल में 120 वोटों का समर्थन अंतरराष्ट्रीय कानून और बल का आनुपातिक उपयोग का बहुत ही उच्च संकेत है।
संयुक्त राष्ट्र में फ्रांस के राजदूत निकोलस डी रिवियेर ने कहा कि उनका देश प्रस्ताव का समर्थन करता है क्योंकि नागरिकों की पीड़ा को उचित नहीं ठहरा जा सकता है। उन्होंने मानवीय संघर्ष विराम स्थापित करने के लिए सामूहिक प्रयास करने का आग्रह किया। संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीनी दूत रियाद मंसूर ने कहा कि यूरोपीय वोट से संकेत प्राप्त होता है कि वे सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने या इस युद्ध को रोकने के लिए इजरायल पर अधिकतम दबाव बनाने में बहुत मददगार साबित हो सकते हैं। उन्होंने विभाजित सुरक्षा परिषद की तुलना में महासभा को ज्यादा साहसी, ज्यादा सैद्धांतिक करार दिया, जो एक प्रस्ताव पर सहमति बनाने में पिछले दो हफ्तों में चार कोशिशों में विफल रहा। दो में वीटो कर दिया गया और दो में अनुमोदन के लिए आवश्यक न्यूनतम वोट प्राप्त नहीं हो सका।
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के राजदूत मुनीर अकरम ने जब कहा, अरब-मसौदा प्रस्ताव में जानबूझकर इज़रायल की निंदा या उल्लेख नहीं किया गया या किसी अन्य पार्टी का नाम नहीं लिया गया है, तब उनके वक्तव्य पर जोरदार तालियां बजीं। उन्होंने कहा कि अगर कनाडा (जिसने संशोधन पेश किया) वास्तव में न्यायसंगत है, तो वह या तो सभी का नाम लेने में सहमत होगा, दोनों पक्ष जो अपराध के दोषी हैं या वह दोनों में से किसी का नाम नहीं लेगा जैसा कि हमने चुना है। संशोधन अपने पक्ष या विपक्ष में मतदान करने वालों का दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा। भारत ने पहली बार संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन पर किसी प्रस्ताव के लिए मतदान में हिस्सा नहीं लिया। भारतीय राजदूत ने कहा कि भारत ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि प्रस्ताव में हमास की निंदा नहीं की गई।
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