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टोक्यो का अधूरा मिशन पेरिस में पूरा करेंगे, क्वालीफायर के रास्ते ही सही : महिला हॉकी कप्तान सविता  – Utkal Mail


हांगझोऊ। टोक्यो में जो मिशन अधूरा रह गया था उसे पेरिस में हमें पूरा करना है और एशियाई खेलों के जरिये भले ही सीधे क्वालीफाई नहीं कर पाये लेकिन क्वालीफायर के रास्ते जाकर ही हम कर दिखायेंगे यह कहना है भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान सविता पूनिया का। हांगझोउ एशियाई खेलों में खिताब की प्रबल दावेदार के रूप में उतरी भारतीय महिला टीम को सेमीफाइनल हराकर चीन ने पेरिस ओलंपिक 2024 के लिये सीधे क्वालीफाई करने का उसका सपना तोड़ दिया । भारत ने जापान को हराकर कांस्य पदक जीता। 

हांगझोऊ से लौटने के बाद सविता ने कहा, हमारे पास अफसोस करने का समय नहीं था और मैने जापान के खिलाफ मुकाबले से पहले खिलाड़ियों से इतना ही कहा कि जो बीत गई , वो बात गई और अब खाली हाथ नहीं लौटना है। उन्होंने कहा कि अब हर खिलाड़ी को यह यकीन दिलाना है कि क्वालीफायर के रास्ते ही सही , तोक्यो में अधूरा रहा मिशन पेरिस में पूरा करना है । उन्होंने कहा, हम पांच दिन के ब्रेक के बाद कैंप में जायेंगे। सभी खिलाड़ियों से बात करेंगे, यकीन दिलायेंगे कि हम कर सकते हैं और करेंगे।

इस अनुभवी गोलकीपर ने कहा,  आज की हॉकी में हर दिन हर मैच में अच्छा खेलना होता है । टीम बहुत अच्छी है और हमारे पास क्वालीफायर (जनवरी में चीन या स्पेन में) के लिये तीन महीने हैं। हम अपनी कमियों पर मेहनत करेंगे ।अगर अपनी हॉकी खेलेंगे तो किसी भी टीम के लिये कड़ी चुनौती पेश करेंगे। तोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक का मुकाबला हारने के बाद गोलकीपर सविता के आंसू नहीं थम रहे थे । वहीं हांगझोउ एशियाई खेलों में बतौर कप्तान उतरी सविता पर युवा खिलाड़ियों के आंसू रोककर उन्हें कांस्य के मुकाबले के लिये तैयार करने की जिम्मेदारी थी । कांस्य पदक के मुकाबले में हूटर बजते ही आम तौर पर अपने जज्बात पर काबू रखने वाली डच कोच यानेके शॉपमैन मैदान पर फफक पड़ी।

 सविता ने कहा, कोच को पता था कि टीम क्या डिजर्व करती है। वह कांस्य के बाद बहुत इमोशनल हो गई क्योंकि इस टीम को उन्होंने स्वर्ण के लिये तैयार किया था। उन्होंने कहा, किसी को बताने की जरूरत नहीं थी कि गलती कहां हुई । सभी को पता था कि वह कहां चूक गए। युवा खिलाड़ी शायद बड़े मैच का दबाव नहीं झेल पाये। उन्होंने कहा,‘‘ हम बहुत अच्छी तैयारी के साथ गए थे और वाकई स्वर्ण जीत सकते थे लेकिन चीन से हार गए और पदक के लिये जापान जैसी अच्छी डिफेंसिव टीम से था। हमारे पास रोने, दुख मनाने और उदास होने के लिये एक ही दिन का समय था ।पिछले दो बार से हमने पदक जीता था और हम किसी सूरत में खाली हाथ नहीं लौटना चाहते थे। 

पहली बार 2014 इंचियोन खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली इस अनुभवी गोलकीपर ने कहा, कुछ खिलाड़ियों का यह पहला एशियाई खेल था और उनका मनोबल बनाये रखने के लिये पदक बहुत जरूरी था । बहुत मुश्किल था लेकिन हम किसी हालत में खाली हाथ नहीं लौटना चाहते थे ।’’ उन्होंने कहा ,‘‘इस पदक के लिये खिलाड़ियों ने काफी बलिदान दिये थे। हमने फिटनेस पर बहुत मेहनत की थी। पिछले एक साल में नेशन कप, राष्ट्रमंडल खेल, बेंगलुरू में लंबा शिविर सब बहुत अच्छा रहा। लेकिन सेमीफाइनल में हम अपनी गेम नहीं खेल पाये।

वहीं रियो ओलंपिक में टीम की कप्तान रही मणिपुर की अनुभवी फुल बैक सुशीला चानू ने कहा,‘‘ मैंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन भारत के लिये खेलूंगी । मणिपुर में मुक्केबाजी का ज्यादा क्रेज है लेकिन मैने हॉकी चुनी और देश के लिये खेलने पर गर्व है।’’ उन्होंने कहा ,‘‘ हम सभी सीनियर ने प्लेआफ मैच से पहले जूनियर खिलाड़ियों को प्रेरित किया कि 2014 में हमें कांस्य मिला था तो उसके क्या मायने थे और हमारी जीत आने वाली पीढी के लिये कितने मायने रखेगी।

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