टेक्नोलॉजी

ऑनलाइन ट्रेनिंग लेकर धुरंधर बन रहे साइबर ठग, ऐप बनाकर कर रहे फर्जीवड़ा – Utkal Mail

लखनऊ, अमृत विचार: साइबर अपराधियों ने ठगी का नया तरीका अपना लिया है। अब फर्जी ऐप तैयार करना सीख गये हैं। वह इस फर्जी ऐप के जरिये लोगों के मोबाइल हैक कर खाते से रकम खाली कर रहे हैं। यह ऐप सॉफ्टवेयर इंजीनियर से ऑन लाइन ट्रेनिंग लेकर बनाया है। जो एंटी वायरस की पकड़ में भी नहीं आ रहा है। साइबर विशेषज्ञों की माने तो इस ऐप से ठगी की शुरूआत झारखंड के जामताड़ा गिरोह ने की है। इसे बनाने के लिए जालसाज जावा प्रोग्रामिंग का प्रयोग कर रहे है।

साइबर विशेषज्ञ व साइबर क्राइम थाना इंस्पेक्टर बृजेश कुमार यादव के मुताबिक फर्जी ऐप से ठगी के मामले सामने आने लगे हैं। इस तरह के एक गिरोह का खुलासा केंद्रीय गृहमंत्रालय की संस्था आई4सी ने किया। टीम ने इस मामले में जामताड़ा के छह साइबर ठगों को दबोचा था। पूछताछ में इन जालसाजों ने कुबूल किया था कि 22 माह पहले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर से ऑन लाइन संपर्क कर प्रशिक्षण लिया था। इसके बाद इस ऐप का निर्माण किया। इसके जरिये पहले टारगेट से 11 करोड़ रुपये की ठगी की थी। जालसाजों ने बताया कि गिरोह जावा प्रोग्रामिंग का प्रयोग कर सरकारी योजनाओं के नाम से मिलते-जुलते ऐप बनाकर ठगी करते हैं।

एआई चैटबॉट का किया प्रयोग

इंस्पेक्टर साइबर क्राइम थाना बृजेश यादव ने बताया कि जांच में सामने आया कि चैट जीपीटी का प्रयोग कर साइबर अपराधियों ने एआई आधारित चैटबॉट का प्रयोग किया था। जब कभी ऐप में दिक्कत आती तो ये चैट जीपीटी का प्रयोग कर नया कोड जेनरेट कराते थे। इसके बाद फर्जी ऐप एंटी वायरस को भी बाइपास कर जाता था। इसकी कारण यह ऐप एंटी वायरस के पकड़ में नहीं आता है। ऐप को ये उपभोक्ताओं के मोबाइल में एपीके के जरिए इंस्टाल कराते थे। एपीके फाइल इंस्टॉल होते ही फोन में मौजूद बैंक खाते, ओटीपी की जानकारी, सारे एसएमएस और कॉल का डाटा साइबर अपराधियों तक पहुंचता था। इस डाटा की मॉनिटरिंग के लिए अपराधियों ने अलग से वेबसाइट बनाई थी।

डाउनलोड करते ही होता है डाटा हैक

इंस्पेक्टर ने बताया कि जावा प्रोग्रामिंग का प्रयोग कर सरकारी योजनाओं के नाम पर मिलते-जुलते ऐप बनाते हैं। ऐप में दिक्कत आने पर नया कोड जेनरेट कर देते हैं। फिर चैट जीपीटी से बने ऐप को एपीके फाइल के जरिये मोबाइल में इंस्टॉल कराते हैं। एपीके फाइल मोबाइल में डाउनलोड होते ही सारा डाटा अपराधियों के पास पहुंचता है। मोबाइल से मिले डाटा की मॉनिटरिंग के लिए जालसाजों ने अलग से वेबसाइट भी बना रखी है।

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